उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHamushi mein kabhi sadaon mein

ख़ामुशी में कभी सदाओं में

خامشی میں کبھی صداؤں میں

शायर: Tahira Jabeen Tara7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ामुशी में कभी सदाओं में
खो गई अजनबी फ़ज़ाओं में

न सफ़र है न है सुकून मुझे
कैसी गर्दिश है मेरे पाँव में

चीख़ती है ये तीरगी शब की
चाँद ख़ामोश है घटाओं में

क्या है जो ख़ाक पर नहीं मौजूद
ढूँडते हैं किसे ख़लाओं में

साँस लेते हुए भी डरती हूँ
किस क़दर ज़हर है हवाओं में

ऐ ग़म-ए-हिज्र बख़्शने वाले
याद रखना हमें दु'आओं में

दिल परेशाँ है इस तरह 'तारा'
हो गई मर्ग जैसे गाँव में