उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ham-safar kahan pahunche kuchh pata nahin milta

हम-सफ़र कहाँ पहुँचे कुछ पता नहीं मिलता

ہم سفر کہاں پہنچے کچھ پتا نہیں ملتا

शायर: Tahira Jabeen Tara6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम-सफ़र कहाँ पहुँचे कुछ पता नहीं मिलता
रास्ते हैं सब चुप-चुप नक़्श-ए-पा नहीं मिलता

उन हसीन लम्हों को भूलना भी कब चाहूँ
लेकिन उस की यादों में वो मज़ा नहीं मिलता

ज़ीस्त के सफ़र में भी रूह के नगर में भी
उस को ढूँढती हूँ मैं और पता नहीं मिलता

कौन यूँ बुलाता है हर तरफ़ सदाएँ हैं
ये क़दम तो उठते हैं रास्ता नहीं मिलता

अपने आप को हर दम खोजती ही रहती हूँ
अपनी ज़ात का लेकिन कुछ सिरा नहीं मिलता

यूँ तो दूर तक 'तारा' सब फ़ज़ा मो'अत्तर है
और हवा को आँगन का दर खुला नहीं मिलता