उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHak-e-bashar ab gili hona baqi hai

ख़ाक-ए-बशर अब गीली होना बाक़ी है

خاک بشر اب گیلی ہونا باقی ہے

शायर: Chiraguddin Charagh6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ाक-ए-बशर अब गीली होना बाक़ी है
मौसम में तब्दीली होना बाक़ी है

जाने कितने राज़ हैं इस में पोशीदा
बंद है मुट्ठी ढीली होना बाक़ी है

शो'लों का आज़ार भी तुझ को सहना है
फ़िक्र की रात भी पीली होना बाक़ी है

दस्त-ए-शफ़क़त सर पर अपने रहने दे
धूप अभी चमकीली होना बाक़ी है

उस की बातें मीठी मीठी हैं लेकिन
आज फ़ज़ा ज़हरीली होना बाक़ी है

जलते-बुझते ज़ख़्मों के रौशन हैं चराग़
शाम अभी रंगीली होना बाक़ी है