उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kaun nikle ghar se bahar raat mein

कौन निकले घर से बाहर रात में

کون نکلے گھر سے باہر رات میں

शायर: Vikram Sharma8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कौन निकले घर से बाहर रात में
सो गए हम अपने अंदर रात में

फिर से मिलने आ गईं तन्हाइयाँ
क्यों नहीं खुलते हैं दफ़्तर रात में

हम जुटा लेते हैं बिस्तर तो मगर
रोज़ कम पड़ती है चादर रात में

रोज़ ही वो एक लड़की सुब्ह सी
जाती है हम को जगा कर रात में

ख़्वाब देखा है इसी का रात भर
सोए थे जिस को भुला कर रात में

ज़िंदगी भर की कमाई एक रात
जो मिली ख़ुद को गँवा कर रात में

साँप दो आते हैं हम को काटने
उस की यादें और ये घर रात में

ज़िंदगी की रात इक दिन ख़त्म हो
ये दुआ करते हैं अक्सर रात में