उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kasrat-e-tamasha ko wahdat-ashna paya

कसरत-ए-तमाशा को वहदत-आश्ना पाया

کثرت تماشا کو وحدت آشنا پایا

शायर: Maharaja Sir Kishan Parashad Shad12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कसरत-ए-तमाशा को वहदत-आश्ना पाया
हस्ती-ए-फ़ना में भी जल्वा-ए-बक़ा पाया

क्या हुआ ख़िज़र ने जो चश्मा-ए-बक़ा पाया
जीने पर मरे तो क्या जीने का मज़ा पाया

जज़्बा-ए-नज़ारा है आँख की ख़ता क्या है
का'बे में सनम देखा दैर में ख़ुदा पाया

ख़ूँ हुआ तमन्ना का ज़ुल्म सर-बसर देखा
दिल को इम्तिहाँ में भी सब्र-आज़मा पाया

हो गया है कसरत में राज़ आश्कार उस का
शान हर जगह देखी जल्वा जा-ब-जा पाया

दर्द से हुईं पैदा दिल में सौ तमन्नाएँ
ज़िंदगी-ए-लज़्ज़त को दर्द-आश्ना पाया

पर्दा-दर ख़मोशी है बे-हिजाब आँखें हैं
राज़-ए-बज़्म-ए-दुश्मन का हम ने कुछ पता पाया

हुस्न की कशिश ही में रहबरी की क़ुव्वत थी
गुमरहान-ए-उल्फ़त ने राह का पता पाया

राज़ हो गया इफ़्शा उठ गया हिजाब आख़िर
आँख से छुपे तो क्या दिल में ज़ाहिरा पाया

याद आ गया दिल को फिर अलस्त का पैमाँ
फिर जबीं को का'बा से सज्दा-आश्ना पाया

इश्क़ क्या किया हम ने सख़्तियाँ सदा झेलीं
दिल को हर मुसीबत में जुरअत-आज़मा पाया

मो'जिज़ा अदब का है 'शाद' हर कलाम अपना
नुक्ता-रस तबीअ'त ने नुत्क़ क्या रसा पाया