उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kam kabhi rah ke aazar to hote honge

कम कभी राह के आज़ार तो होते होंगे

کم کبھی راہ کے آزار تو ہوتے ہوں گے

शायर: R P Shokh6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कम कभी राह के आज़ार तो होते होंगे
आबला-पाई कहीं ख़ार तो होते होंगे

मुझ से ये सोच के वो मेरा पता पूछे था
तंग-दस्तों के भी घर-बार तो होते होंगे

उस से बिछड़ा मैं अँधेरों का मकीं हूँ वर्ना
कोई घर हो दर-ओ-दीवार तो होते होंगे

वो जहाँ भी हो उसे देख के इस शहर के लोग
कू-ब-कू नक़्श-ब-दीवार तो होते होंगे

मर्ग जो अपनी तरह कोई वहाँ हो कि न हो
लोग उसे देख के बीमार तो होते होंगे

बे-गुनह भी था निहत्था भी था मैं ऐ क़ातिल
क़त्ल करने के भी मेयार तो होते होंगे