उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kaise manun ki zamane ki KHabar rakhti hai

कैसे मानूँ कि ज़माने की ख़बर रखती है

کیسے مانوں کہ زمانے کی خبر رکھتی ہے

शायर: Tahir Faraz5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कैसे मानूँ कि ज़माने की ख़बर रखती है
गर्दिश-ए-वक़्त तो बस मुझ पे नज़र रखती है

मेरे पैरों की थकन रूठ न जाना मुझ से
एक तू ही तो मिरा राज़-ए-सफ़र रखती है

धूप मुझ को जो लिए फिरती है साए साए
है तो आवारा मगर ज़ेहन में घर रखती है

दोस्ती तेरे दरख़्तों में हवाएँ भी नहीं
दुश्मनी अपने दरख़्तों में समर रखती है

जाने क्या सोच के रो लेता हूँ उस वक़्त 'फ़राज़'
ज़िंदगी जब मिरे आग़ोश में सर रखती है