उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kaise kah dun kahin elan nahin karta hai

कैसे कह दूँ कहीं ए'लान नहीं करता है

کیسے کہہ دوں کہیں اعلان نہیں کرتا ہے

शायर: Aalam Nizami5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कैसे कह दूँ कहीं ए'लान नहीं करता है
वो भी ख़ामोशी से एहसान नहीं करता है

दिल को तहरीक-ए-तरक़्क़ी तो बहुत मिलती है
हौसला फिर भी ये नादान नहीं करता है

आप के नाम से मंसूब हुए हैं जब से
अब हमें कोई परेशान नहीं करता है

काम करता है बहुत ग़ैर-ज़रूरी लेकिन
जो ज़रूरी है वो इंसान नहीं करता है

है ये मुमकिन हो वही शख़्स मुनाफ़िक़ 'आलम'
जो बज़ाहिर कोई नुक़्सान नहीं करता है