उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kai jalwe teri pahchan ke dhoke se nikle hain

कई जल्वे तिरी पहचान के धोके से निकले हैं

کئی جلوے تری پہچان کے دھوکے سے نکلے ہیں

शायर: Hafiz Karnataki5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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कई जल्वे तिरी पहचान के धोके से निकले हैं
सियासत सैंकड़ों चेहरे तिरे चेहरे से निकले हैं

हमारे दौर के बच्चे सबक़ पढ़ते हैं चाहत का
किताबों के बजाए दिल हर इक बस्ते से निकले हैं

हर इक भाई की ख़्वाहिश है कि बटवारा हो अब घर का
अभी हम मुल्क की तक़्सीम के सदमे से निकले हैं

इधर देखो यहाँ माँ है उधर है बाप बच्चों का
ज़माने भर के सब रिश्ते इसी रिश्ते से निकले हैं

रसन तक कोई जाता है कोई मक़्तल तलक 'हाफ़िज़'
जो रस्ते हुस्न वालों के हसीं कूचे से निकले हैं