उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kahin ye dard ka dhaga bhi yun sulajhta hai

कहीं ये दर्द का धागा भी यूँ सुलझता है

کہیں یہ درد کا دھاگا بھی یوں سلجھتا ہے

शायर: Qamar Iqbal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कहीं ये दर्द का धागा भी यूँ सुलझता है
गिरह जो खोलें तो दिल और भी उलझता है

वो एक बात जो दिल में है मेरे उस के लिए
ज़बाँ से कहता नहीं वो मगर समझता है

मैं तेरी आँखों की ये प्यास किस तरह देखूँ
मिरे वजूद में बादल कोई गरजता है

अजीब चीज़ है ये ख़ूबी-ए-ख़ुतूत-ए-बदन
कोई लिबास हो उस के बदन पे सजता है

ये रात और ये डसती हुई सी तन्हाई
लहू का साज़ 'क़मर' तन-बदन में बजता है