उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab kisi se bhi kisi ka nahin rishta shayad

अब किसी से भी किसी का नहीं रिश्ता शायद

اب کسی سے بھی کسی كا نہیں رشتہ شاید

शायर: Qamar Iqbal6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब किसी से भी किसी का नहीं रिश्ता शायद
चंद लम्हों की है मेहमान ये दुनिया शायद

लाऊँ माज़ी को गवाही के लिए अब कैसे
आइना भूल गया है मिरा चेहरा शायद

ये भँवर है कि दहन खोल रहा है दरिया
सिर्फ़ मैं ही नहीं पानी भी है प्यासा शायद

शहर अब शहर-ए-ख़मोशाँ की तरह लगता है
चेहरा चेहरा है यहाँ जिस्म का कतबा शायद

चाँद हर रात उभरता है उसी जानिब से
रास्ता देख रहा है वो दरीचा शायद

तीर जलती हुई किरनों के 'क़मर' आते हैं
अब बहुत पास है सूरज का जज़ीरा शायद