उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek ek lafz mein hai sandalin jazbon ka bahaw

एक इक लफ़्ज़ में है संदलीं जज़्बों का बहाव

ایک اک لفظ میں ہے صندلیں جذبوں کا بہاؤ

शायर: Qamar Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

एक इक लफ़्ज़ में है संदलीं जज़्बों का बहाव
तेरे लहजे में है किस जू-ए-रवाँ का ठहराव

फिर हुई शाम करे दिल की तवाज़ो' का ख़याल
कोई भूला हुआ मंज़र कोई रिसता हुआ घाव

कोई पत्थर किसी कूचे में न रहने पाए
आज करना है किसी शीश-महल पर पथराव

मैं पिघल जाऊँ न साँसों की हरारत से कहीं
पास इतने भी न आओ कि अकेले रह जाओ

चिलचिलाती हुई ये धूप ये सुनसान डगर
अब जो निकले हो सफ़र को तो ज़रा लुत्फ़ उठाओ

सौंप जाए न कहीं राख का तोहफ़ा ये भी
दिल में अब तक जो सुलगता है तिरे ग़म का अलाव

गुनगुनाओ ‘क़मर-इक़बाल' की ग़ज़लें लेकिन
इक ग़ज़ल उस की उसे भी तो किसी रोज़ सुनाओ