उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dimagh Dubte mahtab sa lage hai mujhe

दिमाग़ डूबते महताब सा लगे है मुझे

دماغ ڈوبتے مہتاب سا لگے ہے مجھے

शायर: Qamar Iqbal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिमाग़ डूबते महताब सा लगे है मुझे
करूँ जो याद तो सब ख़्वाब सा लगे है मुझे

न जाने लोग चले जा रहे हैं किस जानिब
गुज़रता वक़्त भी सैलाब सा लगे है मुझे

हरे हैं जब से मिरे दिल में ज़ख़्म यादों के
ये दश्त और भी शादाब सा लगे है मुझे

निकल न आए किसी रोज़ तोड़ कर सीना
ये दिल भी क़तरा-ए-सीमाब सा लगे है मुझे

तमाम 'उम्र लुटाया जहाँ लहू मैं ने
वो शहर आज भी बे-आब सा लगे है मुझे