उर्दू शायरी · ग़ज़ल

apne sine mein hi har ek talatum rakhna

अपने सीने में ही हर एक तलातुम रखना

اپنے سینے میں ہی ہر ایک تلاطم رکھنا

शायर: Qamar Iqbal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अपने सीने में ही हर एक तलातुम रखना
दिल हो ज़ख़्मी भी तो होंटों पे तबस्सुम रखना

और ज़ख़्मों का इज़ाफ़ा ही सही जब भी मिलें
तू मगर अपना यही तर्ज़-ए-तकल्लुम रखना

मेरे अज़़कार का रिश्ता तिरी आवाज़ से है
मेरे गहनों के लिए अपना तरन्नुम रखना

तू ने क्यों मुझ से बिछड़ते हुए ये बात कही
ख़ुद को तन्हा न बिछड़ने पे कभी तुम रखना

आज जीना भी 'क़मर' एक अदाकारी है
शहर के शोर में तुम ख़ुद को न गुमसुम रखना