उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kahan tamam abhi karbala ka manzar hai

कहाँ तमाम अभी कर्बला का मंज़र है

کہاں تمام ابھی کربلا کا منظر ہے

शायर: Aalam Nizami6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कहाँ तमाम अभी कर्बला का मंज़र है
हमारे साथ नए हौसलों का लश्कर है

तुझे है शौक़ बहुत ज़र्फ़ नापने का मगर
मिरे रफ़ीक़ ये दरिया नहीं समुंदर है

इस इंक़लाब को दुनिया में कौन रोकेगा
जो ज़लज़ले की तरह मेरे दिल के अंदर है

जो दीप जलता रहा रात भर मिरी ख़ातिर
मिरे लिए तो वही सूरजों से बेहतर है

ज़मीन वाले उसे सिर्फ़ देख सकते हैं
वो चाँद है उसे छूना कहाँ मयस्सर है

तिरे बग़ैर भी दीवार-ओ-दर चमकते हैं
तिरे बग़ैर भी घर का दिया मुनव्वर है