उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi zaKHmi karun panw kabhi sar phoD kar dekhun

कभी ज़ख़्मी करूँ पाँव कभी सर फोड़ कर देखूँ

کبھی زخمی کروں پاؤں کبھی سر پھوڑ کر دیکھوں

शायर: Rafiq Sandelvi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी ज़ख़्मी करूँ पाँव कभी सर फोड़ कर देखूँ
मैं अपना रुख़ किसी जंगल की जानिब मोड़ कर देखूँ

समाधी ही लगा लूँ अब कहीं वीरान क़ब्रों पर
ये दुनिया तर्क कर दूँ और सब कुछ छोड़ कर देखूँ

मुझे घेरे में ले रख्खा है अश्या ओ मज़ाहिर ने
कभी मौक़ा' मिले तो इस कड़े को तोड़ कर देखूँ

उड़ा दूँ सब्ज़ पत्तों में छुपी ख़्वाहिश की सब चिड़ियाँ
कभी दिल के शजर को ज़ोर से झिंझोड़ कर देखूँ

अदम-ए-तकमील के दुख से बचा लूँ अपनी सोचों को
जहाँ से सिलसिला टूटे वहीं से जोड़ कर देखूँ