उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi ilm ne use mat di kabhi aagahi ne hara diya

कभी इल्म ने उसे मात दी कभी आगही ने हरा दिया

کبھی علم نے اسے مات دی کبھی آگہی نے ہرا دیا

शायर: Aalam Nizami6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी इल्म ने उसे मात दी कभी आगही ने हरा दिया
जिसे तीरगी न हरा सकी उसे रौशनी ने हरा दिया

कभी ख़ुश्क उन के न लब हुए रही जिन की क़तरों से दोस्ती
जो समुंदरों के रफ़ीक़ थे उन्हें तिश्नगी ने हरा दिया

जिन्हें बेबसी न हरा सकी उन्हें फिर न कोई हरा सका
जो ज़रूरतों के ग़ुलाम थे उन्हें हर किसी ने हरा दिया

हमें सर-बुलंदी अता हुई जहाँ जिस महाज़ पे डट गए
मरे रोज़ जिस की तलब में हम उसी ज़िंदगी ने हरा दिया

न है इल्म-ओ-फ़न की तलब तुम्हें न तरक़्क़ियों का जुनून है
जो तुम्हारा तर्ज़-ए-हयात है तुम्हें बस उसी ने हरा दिया

रह-ए-इश्क़ में जो फ़ना हुए उन्हें जावेदानी अता हुई
जो असीर-ए-हुस्न-ए-हयात थे उन्हें बे-हिसी ने हरा दिया