उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kab wo tanhai ke aasar se ghabrae hain

कब वो तन्हाई के आसार से घबराए हैं

کب وہ تنہائی کے آثار سے گھبرائے ہیں

शायर: Ehsaan Ghaman6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कब वो तन्हाई के आसार से घबराए हैं
लोग तो रौनक़-ए-बाज़ार से घबराए हैं

कौन करता है भला आबला-पाई का गिला
हम तो बस रस्तों की रफ़्तार से घबराए हैं

अपने क़ामत से निकलना पड़ा बाहर उन को
जो शजर साया-ए-दीवार से घबराए हैं

लोग क़ीमत तो लगाएँगे ये बाज़ार तो है
बे-वज्ह हम तो ख़रीदार से घबराए हैं

किस लिए माँग रहे हैं मिरी दस्तार वो लोग
जो मरी जुरअत-ए-गुफ़्तार से घबराए हैं

हम को ऐसे नहीं आवारगी सूझी 'एहसान'
हम तो अपने दर-ओ-दीवार से घबराए हैं