उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab par-e-parwaz mera aasman mein aa gaya

जब पर-ए-पर्वाज़ मेरा आसमाँ में आ गया

جب پر پرواز میرا آسماں میں آ گیا

शायर: Ehsaan Ghaman7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब पर-ए-पर्वाज़ मेरा आसमाँ में आ गया
इक परिंदा भी सफ़-ए-सय्यारगाँ में आ गया

मैं पस-ए-पर्दा कोई गुमनाम सा किरदार था
ज़िक्र मेरा कैसे तेरी दास्ताँ में आ गया

ये ज़रूरी तो नहीं हिजरत परिंदे ही करें
धूप जिस को भी लगी वो साएबाँ में आ गया

आसमाँ पर इक दिए की लौ उछाली थी फ़क़त
लौट कर सारा उजाला ख़ाक-दाँ में आ गया

जब मिरी उम्र-ए-रवाँ उँगली पकड़ कर चल पड़ी
देख मैं फिर से तिरे वहम-ओ-गुमाँ में आ गया

मैं ने चक्खी थी किसी के नर्म लहजे की मिठास
क्या बताऊँ ज़ाइक़ा कैसा ज़बाँ में आ गया

एक सहरा चल पड़ा 'एहसान' मेरे साथ क्या
वो भी मेरे हल्क़ा-ए-आवारगाँ में आ गया