उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kab KHamoshi ko mohabbat ki zaban samjha tha main

कब ख़मोशी को मोहब्बत की ज़बाँ समझा था मैं

کب خموشی کو محبت کی زباں سمجھا تھا میں

शायर: Darshan Singh6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कब ख़मोशी को मोहब्बत की ज़बाँ समझा था मैं
था 'अयाँ वो राज़-ए-दिल जिस को निहाँ समझा था मैं

सुन रहा हूँ अपनी ख़ामोशी का चर्चा कू-ब-कू
थी फ़ुग़ाँ वो भी जिसे ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ समझा था मैं

'आरज़ी सा 'अक्स था इक इल्तिफ़ात-ए-दोस्त का
जिस को नादानी से ऐश-ए-जावेदाँ समझा था मैं

तुम ने आँखें फेर लीं मुझ से तो ये मुझ पर खुला
ख़ार-ज़ार-ए-ज़िंदगी को गुलसिताँ समझा था मैं

वो भी निकले बर्क़-ओ-बाद-ओ-बाग़्बाँ की मिलकियत
चार तिनके जिन को अपना आशियाँ समझा था मैं

कर सकें 'दर्शन' न वो भी अर्ज़-ए-हाल-ए-आरज़ू
जिन निगाहों को मोहब्बत की ज़बाँ समझा था मैं