उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kash aisa koi manzar hota

काश ऐसा कोई मंज़र होता

کاش ایسا کوئی منظر ہوتا

शायर: Tahir Faraz5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

काश ऐसा कोई मंज़र होता
मेरे काँधे पे तिरा सर होता

जम्अ' करता जो मैं आए हुए संग
सर छुपाने के लिए घर होता

इस बुलंदी पे बहुत तन्हा हूँ
काश मैं सब के बराबर होता

उस ने उलझा दिया दुनिया में मुझे
वर्ना एक और क़लंदर होता

वो जो ठोकर न लगाते मुझ को
मैं किसी राह का पत्थर होता