उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jitne bhi aae zinat-e-bazar ho gae

जितने भी आए ज़ीनत-ए-बाज़ार हो गए

جتنے بھی آئے زینت بازار ہو گئے

शायर: Nafas Ambalvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जितने भी आए ज़ीनत-ए-बाज़ार हो गए
इक हम ही थे जो साहिब-ए-किरदार हो गए

झूटों पे तेरे शहर में इल्ज़ाम तक नहीं
और हम ने सच कहा तो गुनहगार हो गए

जब भी कहीं चराग़ जला है सुकूत-ए-शब
सब लोग आंधियों के तरफ़-दार हो गए

वो ज़ालिमों के साथ हैं मज़लूम बे-अमाँ
कैसे हमारे अह्द के अख़बार हो गए

ख़तरे में है अब अपने क़बीले की आबरू
जो मुख़बिरों में थे वही सरदार हो गए

टपका लहू 'नफ़स' के बदन से तो यूँ हुआ
क़तरे जहाँ-जहाँ गिरे अश'आर हो गए