उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jism ka ghar hi gira hai to na jaan Thahregi

जिस्म का घर ही गिरा है तो न जाँ ठहरेगी

جسم کا گھر ہی گرا ہے تو نہ جاں ٹھہرے گی

शायर: R P Shokh5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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जिस्म का घर ही गिरा है तो न जाँ ठहरेगी
याद आई भी किसी की तो कहाँ ठहरेगी

थक के बैठा हूँ मगर ज़िंदगी भागी जाए
मैं चला जाऊँगा तो उम्र-ए-रवाँ ठहरेगी

उस के दर से जो उठे शहर से फिर क्या मतलब
किसी सहरा में ही अब नक़्ल-ए-मकाँ ठहरेगी

भूल कर भी न भुलाना उसे ऐ दिल वर्ना
ये सुबुक-दोशी भी इक बार-ए-गराँ ठहरेगी

ख़ुद पे हर रुत को गुज़रते हुए देखा था मगर
क्या ख़बर थी कि यहीं एक ख़िज़ाँ ठहरेगी