उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jis tarah bachche buzurgon ke charan chumte hain

जिस तरह बच्चे बुज़ुर्गों के चरण चूमते हैं

جس طرح بچے بزرگوں کے چرن چومتے ہیں

शायर: Aalam Nizami6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिस तरह बच्चे बुज़ुर्गों के चरण चूमते हैं
हम मोहब्बत से मोहब्बत का बदन चूमते हैं

मुँह लगाते नहीं बाज़ार के फूलों को कभी
हम फ़क़त अपने गुलाबों के दहन चूमते हैं

मैं ने हालात पे रक्खी है ग़ज़ल की बुनियाद
इस लिए लोग मिरा रंग-ए-सुख़न चूमते हैं

मुँह पे मल लेते हैं हम ख़ाक-ए-मदीना की तरह
माँ के क़दमों की तरह ख़ाक-ए-वतन चूमते हैं

ज़िंदगी में तो उन्हें बोझ समझते हैं मगर
लोग मरने पे बुज़ुर्गों का कफ़न चूमते हैं

और बढ़ जाता है मंज़िल पे पहुँचने का सुरूर
आबले जब मिरे पैरों की थकन चूमते हैं