उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jis ne riwayaton ki qaba tar-tar ki

जिस ने रिवायतों की क़बा तार-तार की

جس نے روایتوں کی قبا تار تار کی

शायर: Iftikhar Raghib7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिस ने रिवायतों की क़बा तार-तार की
कहते हैं उस ने राह नई इख़्तियार की

कर दी है उस ने अब तो मज़ालिम की इंतिहा
छिड़ जाए अब न जंग कहीं आर-पार की

सा'अत को पहले 'उम्र से तक़्सीम कर दिया
फिर तेरे इंतिज़ार की सा'अत शुमार की

तू है सुख़न का ताज-महल ऐ मिरी ग़ज़ल
क्या दाद कोई दे तिरे नक़्श-ओ-निगार की

आह-ओ-फ़ुग़ाँ से हिलने लगी सारी काइनात
खुलती नहीं है आँख मगर पहरे-दार की

देता नहीं है दिल ही मिरा साथ क्या करूँ
मैं ने तो भूल जाने की कोशिश हज़ार की

शामिल करें उसे भी असासी हुक़ूक़ में
'राग़िब' हर आदमी को ज़रूरत है प्यार की