उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aag ke sath hi pani bhi baham rakhna tha

आग के साथ ही पानी भी बहम रखना था

آگ کے ساتھ ہی پانی بھی بہم رکھنا تھا

शायर: Iftikhar Raghib5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आग के साथ ही पानी भी बहम रखना था
दिल में था इश्क़ तो आँखों को भी नम रखना था

मुझ को मालूम था बदली हुई रुत का अंजाम
फिर भी बे-ताब उमंगों का भरम रखना था

अब कहाँ दिल की तलब अक़्ल से हो कुछ इमदाद
इक ज़रा सोच के पहला ही क़दम रखना था

उन से उम्मीद न रखता मैं वफ़ा की कैसे
दस्त-ए-उल्फ़त में मोहब्बत का इल्म रखना था

शिद्दत-ए-इश्क़ में करना था इज़ाफ़ा 'राग़िब'
और बे-ताबी-ए-जज़बात को कम रखना था