उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jidhar bhi dekho wahin nazar mein tanhai

जिधर भी देखो वहीं नज़र में तन्हाई

جدھر بھی دیکھو وہیں نظر میں تنہائی

शायर: Madho Kaushik6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिधर भी देखो वहीं नज़र में तन्हाई
फैला गई है पूरे घर में तन्हाई

भीड़ बहुत है लेकिन मुझ को लगता है
सिर्फ़ चलेगी साथ सफ़र में तन्हाई

आने वाली पीढ़ी की क़िस्मत देखो
उन्हें मिलेंगे नगर नगर में तन्हाई

पत्ते भी हिलते हैं पर ख़ामोशी से
ढूँड रही है हवा शजर में तन्हाई

मन का ख़ाली-पन ख़ाली है कुछ इतना
दिल भी तन्हा और जिगर में तन्हाई

तन्हाई से डर जाने का ग़म कैसा
मुश्किल से मिलती है घर में तन्हाई