उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jawaz kya hai ki is shahr ki tabahi na ho

जवाज़ क्या है कि इस शहर की तबाही न हो

جواز کیا ہے کہ اس شہر کی تباہی نہ ہو

शायर: Jaleel 'Aali'5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जवाज़ क्या है कि इस शहर की तबाही न हो
जहाँ किसी ने भी रस्म-ए-वफ़ा निबाही न हो

वो ग़म मिला है कि दिल से दु'आ निकलती है
ये इम्तिहाँ किसी दुश्मन का भी इलाही न हो

ज़बाँ पे हर्फ़-ए-तमन्ना भी रुक नहीं सकता
ये ख़ौफ़ भी है कि बरहम मिज़ाज-ए-शाही न हो

छटी न तीरगी-ए-दिल तो फ़ाएदा प्यारे
हज़ार चाहे क़बा पर कहीं सियाही न हो

वो गुफ़्तुगू में फ़रिश्ता सही मगर 'आली'
जब उस के पास भी किरदार की गवाही न हो