उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jannat ke phal zamin pe girane ki der thi

जन्नत के फल ज़मीं पे गिराने की देर थी

جنت کے پھل زمیں پہ گرانے کی دیر تھی

शायर: Daniyal Tareer7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जन्नत के फल ज़मीं पे गिराने की देर थी
इक बार आसमान हिलाने की देर थी

मैं पेड़ में क़ियाम करूँगा तमाम 'उम्र
ये बात ताएरों को बताने की देर थी

ये रम्ज़ मुझ पे ग़ैर का एहसान जानिए
उस दिल में एक फूल खिलाने की देर थी

उस चश्म-ए-नीम-बाज़ की ख़्वाबीदगी की ख़ैर
जैसे उसे ये ख़्वाब सुनाने की देर थी

अफ़्लाक चाक होने लगे चाँद शक़ हुआ
शायद मिरे चराग़ जलाने की देर थी

फिर मैं था अज़दहों का 'इलाक़ा था ख़ौफ़ था
अपनी तरफ़ ख़ुदा को बुलाने की देर थी

तुझ तक पहुँचने में मुझे सदियाँ लगीं मगर
मेरी नहीं थी ये तो ज़माने की देर थी