उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab tujhe mimbar-e-yaqut kaTahra hua tha

जब तुझे मिम्बर-ए-याक़ूत कटहरा हुआ था

جب تجھے منبر یاقوت کٹہرا ہوا تھا

शायर: Idris Azad5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब तुझे मिम्बर-ए-याक़ूत कटहरा हुआ था
मैं सर-ए-अर्श तिरे सामने ठहरा हुआ था

यूँही बेकार गए सारे हकीमों के इलाज
ज़ख़्म-ए-तफ़्हीम ख़ुराफ़ात से गहरा हुआ था

तेरी आवाज़ क़यामत में भी पहचान गया
गो कि मैं सूर-ए-सराफ़ील से बहरा हुआ था

जो शजर साया-ए-अश्जार में थे जल गए थे
धूप सह सह के मिरा खेत सुनहरा हुआ था

आतिश-ए-शौक़ तनासुब में उसी दर्जा थी तेज़
जिस क़दर तेरी मुलाक़ात पे पहरा हुआ था