उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab talak wo sath tha ek gungunati dhup thi

जब तलक वो साथ था इक गुनगुनाती धूप थी

جب تلک وہ ساتھ تھا اک گنگناتی دھوپ تھی

शायर: Yasir Raza Asif7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब तलक वो साथ था इक गुनगुनाती धूप थी
हर तरफ़ ही सर्दियों की मुस्कुराती धूप थी

ख़्वाब में आया था कोई रौशनी पहने हुए
और चेहरे पर सुनहरी झिलमिलाती धूप थी

खिल उठे थे ज़ख़्म सारे सुर्ख़ फूलों की तरह
वो तुम्हारी याद थी या मो’जज़ाती धूप थी

चल दिया था मैं अकेला ख़ुद से मिलने के लिए
दूर तक बंजर ज़मीं थी चिलचिलाती धूप थी

शाम की परछाइयों में राज़ ये मुझ पर खुला
इस ज़मीं पर हर तरफ़ साए बनाती धूप थी

आसमाँ से जैसे उतरें तितलियों के क़ाफ़िले
बादलों की ओट से यूँ छन के आती धूप थी

अब तो 'आसिफ़' कोहर ने डेरे जमाए हैं मगर
हर तरफ़ उस की हँसी की चहचहाती धूप थी