उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab riha ho jaunga main ranj-o-gham ke dam se

जब रिहा हो जाऊँगा मैं रंज-ओ-ग़म के दाम से

جب رہا ہو جاؤں گا میں رنج و غم کے دام سے

शायर: Maharaja Sir Kishan Parashad Shad11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब रिहा हो जाऊँगा मैं रंज-ओ-ग़म के दाम से
तब कहूँगा अब गुज़रती है बड़े आराम से

फिरते-फिरते थक गए हम साथ कब तक उस का दें
अब तो जी घबरा चला है गर्दिश-ए-अय्याम से

फ़िक्र-ए-दुनिया इक तरफ़ है फ़िक्र-ए-उक़्बा इक तरफ़
किस तरह गुज़रेगी या-रब अपनी अब आराम से

है अलामत ये भी इक मेरी शिकस्त-ए-तौबा की
मय पिलाता है जो साक़ी मुझ को टूटे जाम से

उम्र अपनी सर्फ़ कर दी ज़ुल्फ़-ओ-रुख़ के ध्यान में
काम ही क्या इस जहाँ के हम को सुब्ह-ओ-शाम से

ख़्वाब हो गर सिलसिला जारी रखें तहरीर का
कुछ तशफ़्फ़ी होती है इस नामा-ओ-पैग़ाम से

रात-दिन रंज-ओ-मसाइब का है अब तो सामना
इक ज़माना था गुज़रती थी बहुत आराम से

एक दिन वो था कि चैन आता न था मेरे बग़ैर
आज वो बरहम हुए जाते हैं मेरे नाम से

सख़्तियों से रात-दिन हम को नहीं मिलती नजात
लोग कहते हैं गुज़रती है बड़े आराम से

तुम उसी को सिद्क़-ए-दिल से रात-दिन जपते रहो
मुश्किलें होती हैं आसाँ बस उसी के नाम से

ग़म न खाना रंज के है बा'द राहत भी ज़रूर
सब्र करना 'शाद' गुज़रेगी बहुत आराम से