उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab mal-o-zar iman hua nuqsan hua

जब माल-ओ-ज़र ईमान हुआ नुक़सान हुआ

جب مال و زر ایمان ہوا نقصان ہوا

शायर: Yasir Raza Asif7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब माल-ओ-ज़र ईमान हुआ नुक़सान हुआ
फिर हर जानिब ए'लान हुआ नुक़सान हुआ

थे जिस के हिज्र में शे'र कहे वो लौट आया
फिर पूरा कब दीवान हुआ नुक़सान हुआ

जिन यादों को महदूद किया वो फैल गईं
उन की जानिब मैलान हुआ नुक़सान हुआ

वो मेरे शहर में आ कर भी नहीं मिल पाया
वो दुश्मन का मेहमान हुआ नुक़सान हुआ

फिर बस्ती जल के राख हुई और लोग मरे
बस जारी इक फ़रमान हुआ नुक़सान हुआ

हम सब का होना और न होना एक सा है
अब ये कैसा विज्दान हुआ नुक़सान हुआ

अब शहर में 'आसिफ़' बर्बादी के डेरे हैं
इब्न-ए-आदम भगवान हुआ नुक़सान हुआ