उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab bhi TuTa mere KHwabon ka hasin taj-mahal

जब भी टूटा मिरे ख़्वाबों का हसीं ताज-महल

جب بھی ٹوٹا مرے خوابوں کا حسیں تاج محل

शायर: Tahir Faraz5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब भी टूटा मिरे ख़्वाबों का हसीं ताज-महल
मैं ने घबरा के कही 'मीर' के लहजे में ग़ज़ल

ख़ैर-मक़्दम को तिरे आएगा ख़ुद ही सूरज
तू कभी रात की दहलीज़ से बाहर तो निकल

अपने अफ़्साने से दिलचस्पियाँ कुछ कम कर दे
नींद के बोझ से होने लगीं पलकें बोझल

हादसे राह के ज़ेवर हैं मुसाफ़िर के लिए
एक ठोकर जो लगी है तो इरादा न बदल

बोलने के लिए चाहा है मुझे उस ने 'फ़राज़'
बंद होने के लिए खिलते हैं पानी में कँवल