उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ishq ki koi tafsir thi hi nahin

इश्क़ की कोई तफ़्सीर थी ही नहीं

عشق کی کوئی تفسیر تھی ہی نہیں

शायर: Nadiya ambar lodhi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इश्क़ की कोई तफ़्सीर थी ही नहीं
वास्ते मेरे तक़दीर थी ही नहीं

किस लिए हो के मजबूर तुम आए हो
बीच दोनों के ज़ंजीर थी ही नहीं

आलम-ए-रंग-ओ-बू को सजाया गया
इस तमाशे में तक़्सीर थी ही नहीं

तेरे दर्शन को आँखें तरसती रहीं
ख़ाना-ए-दिल में तस्वीर थी ही नहीं

उस को 'अम्बर' घसीटा गया था यूँही
राँझे के वास्ते हीर थी ही नहीं