उर्दू शायरी · ग़ज़ल

is tarah munkir-e-guftar hue jate hain

इस तरह मुनकिर-ए-गुफ़्तार हुए जाते हैं

اس طرح منکر گفتار ہوئے جاتے ہیں

शायर: Umais Ahmar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस तरह मुनकिर-ए-गुफ़्तार हुए जाते हैं
चुप की इक आहनी दीवार हुए जाते हैं

‘इत्र-दानों से बना रक्खा है रिश्ता उस ने
फूल यूँ ही नहीं बीमार हुए जाते हैं

सारी महफ़िल का भरम रखते हैं तेरी ख़ातिर
वर्ना हम लोग तो बेज़ार हुए जाते हैं

हम नहीं रखते हैं फूलों से त'अल्लुक़ की बिना
हम कि अपने में ही अश्जार हुए जाते हैं

बद-लिहाज़ी में जो मुम्ताज़ हुआ करते थे
आज वो साहिब-ए-किरदार हुए जाते हैं