उर्दू शायरी · ग़ज़ल

inqilab-e-dahr ruk ruk kar jawan banta gaya

इंक़िलाब-ए-दहर रुक रुक कर जवाँ बनता गया

انقلاب دہر رک رک کر جواں بنتا گیا

शायर: Kaleem Ahmadabadi12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इंक़िलाब-ए-दहर रुक रुक कर जवाँ बनता गया
जो सुबुक-सर था वही संग-ए-गिराँ बनता गया

नग़्मा-ए-दिल जब बढ़ा आह-ओ-फ़ुग़ाँ बनता गया
आसमाँ इक और ज़ेर-ए-आसमाँ बनता गया

जाने क्या भर दी हैं उस ने इस चमन में शोख़ियाँ
जो भी आया वो चमन का राज़-दाँ बनता गया

हर-नफ़स को अपनी मंज़िल का पता मिलता नहीं
जो जहाँ ठहरा वहीं इक कारवाँ बनता गया

सर्द आहों का तसर्रुफ़ हो तो सोज़-ए-दिल कहाँ
दिल से जो शो'ला उठा वो भी धुआँ बनता गया

बे-सबब होता नहीं जज़्बात-ए-दिल का वलवला
जिस ने समझा आई अपना राज़-दाँ बनता गया

कुछ बहारों में ख़िज़ाँ है कुछ ख़िज़ाँ में है बहार
फूल मुरझाए तो ग़ुंचा गुलसिताँ बनता गया

आदमी की असलियत को आदमी समझा नहीं
एक क़तरा था जो बहर-ए-बे-कराँ बनता गया

हम तो बैठे ही रहे अपनी असीरी को लिए
बनने वाला काम बे-वहम-ओ-गुमाँ बनता गया

'मीर'-ओ-'ग़ालिब' से बढ़े तो हज़रत-ए-इक़बाल तक
शग़्ल शे'र-ओ-शा'इरी का जावेदाँ बनता गया

दहर में ये भी तो हैं क़ानून-ए-फ़ितरत के उसूल
जो नज़र से गिर गया वो दिलसिताँ बनता गया

बर्क़ की सर-गरमियाँ तसनीम फिर भी ऐ 'कलीम'
बिजलियाँ गिरती रहें और आशियाँ बनता गया