उर्दू शायरी · ग़ज़ल

inkar hi kar dijiye iqrar nahin to

इंकार ही कर दीजिए इक़रार नहीं तो

انکار ہی کر دیجیے اقرار نہیں تو

शायर: Iftikhar Raghib7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इंकार ही कर दीजिए इक़रार नहीं तो
उलझन ही में मर जाएगा बीमार नहीं तो

लगता है कि पिंजरे में हूँ दुनिया में नहीं हूँ
दो रोज़ से देखा कोई अख़बार नहीं तो

दुनिया हमें नाबूद ही कर डालेगी इक दिन
हम होंगे अगर अब भी ख़बर-दार नहीं तो

कुछ तो रहे अस्लाफ़ की तहज़ीब की ख़ुश्बू
टोपी ही लगा लीजिए दस्तार नहीं तो

हम बरसर-ए-पैकार सितमगर से हमेशा
रखते हैं क़लम हाथ में तलवार नहीं तो

भाई को है भाई पे भरोसा तो भला है
आँगन में भी उठ जाएगी दीवार नहीं तो

बे-सूद हर इक क़ौल हर इक शे’र है 'राग़िब'
गर उस के मुआफ़िक़ तिरा किरदार नहीं तो