उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek umr guzari hai tab raaz ye samjha hai

इक उम्र गुज़ारी है तब राज़ ये समझा है

اک عمر گزاری ہے تب راز یہ سمجھا ہے

शायर: Bakhtiyar Ziya4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक उम्र गुज़ारी है तब राज़ ये समझा है
जो कुछ है मोहब्बत है दुनिया है ये उक़्बा है

इक आप का दामन है मा'मूर मुरादों से
इक मेरा गरेबाँ है जो ख़ून में लुथड़ा है

इख़्लास से आरी है अब पुर्सिश-ए-ग़म ऐ दिल
ये रस्म ही दुनिया से उठ जाए तो अच्छा है

इस दौर-ए-कशाकश में हम हूँ कि 'ज़िया' तुम हो
बिखरे हुए मोती हैं टूटा हुआ रिश्ता है