उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek umr guzari hai bala-KHez ghuTan mein

इक 'उम्र गुज़ारी है बला-ख़ेज़ घुटन में

اک عمر گزاری ہے بلا خیز گھٹن میں

शायर: Nadim Nadeem5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक 'उम्र गुज़ारी है बला-ख़ेज़ घुटन में
अब अपने मुक़ाबिल ही उतर आए हैं रन में

इक हूर मिरी जान के आज़ार बढ़ा कर
फिर छुप के कहीं बैठ गई नील गगन में

अब देखना ये है कि धड़कता है ये कितना
थक हार के दिल लौट तो आया है बदन में

वन-वास नहीं होते सभी चौदह बरस के
कुछ लोग हमेशा को चले जाते हैं वन में

बस दूर से गहराई का अंदाज़ा लगाओ
तुम झाँक नहीं पाओगे दरवेश के मन में