उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek shoala-e-hasrat hun miTa kyun nahin dete

इक शो'ला-ए-हसरत हूँ मिटा क्यूँ नहीं देते

اک شعلۂ حسرت ہوں مٹا کیوں نہیں دیتے

शायर: Nafas Ambalvi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक शो'ला-ए-हसरत हूँ मिटा क्यूँ नहीं देते
मुझ को मिरे जीने कि सज़ा क्यूँ नहीं देते

मैं जिन के लिए रोज़ सलीबों पे चढ़ा हूँ
वो मेरी वफ़ाओं का सिला क्यूँ नहीं देते

क्यूँ दर्द की शिद्दत को बढ़ाते हो तबीबो
इस दर्द-ए-मुसलसल की दवा क्यूँ नहीं देते

सुनता हूँ कि हर मोड़ पे रहबर हैं मगर वो
मुझ को मेरी मंज़िल का पता क्यूँ नहीं देते

कुछ बात 'नफ़स' दिल में लिए बैठे हो कब से
आए हो यहाँ तक तो बता क्यूँ नहीं देते