उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek ghalat kirdar ki pahchan mein mara gaya

इक ग़लत किरदार की पहचान में मारा गया

اک غلط کردار کی پہچان میں مارا گیا

शायर: Nafas Ambalvi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक ग़लत किरदार की पहचान में मारा गया
मैं कहानी में नहीं 'उन्वान में मारा गया

पुर-ख़िज़ाँ मौसम में भी शादाब थी रंगत मिरी
मैं वो गुल हूँ जो तिरे गुलदान में मारा गया

घर के बटवारे में बे-शक सब को दौलत मिल गई
ख़ून का रिश्ता मगर दालान में मारा गया

लोग जीना चाहते थे ये हक़ीक़त है मगर
ज़िंदगी को मौत के इम्कान में मारा गया

सब से पहले सोच फिर इंसानियत मारी गई
फिर बहुत कुछ था जो इक इंसान में मारा गया

चंद ग़ज़लें कम-निगाही के सितम सहती रहीं
और कुछ को दफ़्न कर दीवान में मारा गया

फिर हर इक साए ने रूपोशी की चादर ओढ़ ली
शाम का सूरज भी जब मैदान में मारा गया

माजरा क्या था 'नफ़स' किस की थी वो आह-ओ-फ़ुग़ाँ
कौन था कल रात जो ज़िंदान में मारा गया