उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek dhuan uTh raha hai aangan se

इक धुआँ उठ रहा है आँगन से

اک دھواں اٹھ رہا ہے آنگن سے

शायर: Rafiq Raaz8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक धुआँ उठ रहा है आँगन से
हैं अभी कुछ चराग़ रौशन से

इस में शामिल है बू-ए-अफ़्लाकी
ये हवा आ रही है किस बन से

देने आया हूँ फ़त्ह का मुज़्दा
भाग आया नहीं हूँ मैं रन से

मंज़िलों की भी आरज़ू है बहुत
डर भी लगता है मुझ को रन-बन से

अब भी क्या रात के अँधेरे में
शो'ला उठता है गुलशन-ए-तन से

सुर्ख़-रू 'इश्क़ की बदौलत हूँ
कि मैं इस आग में हूँ बचपन से

ये ज़माना है चापलूसी का
हम तो वाक़िफ़ नहीं इसी फ़न से

मुझ से पहचान तेरी क़ाएम है
मैं तुम्हें चाहता हूँ तन-मन से