उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek aawara sa lamha kya qafas mein aa gaya hai

इक आवारा सा लम्हा क्या क़फ़स में आ गया है

اک آوارہ سا لمحہ کیا قفس میں آ گیا ہے

शायर: Jaleel 'Aali'6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक आवारा सा लम्हा क्या क़फ़स में आ गया है
लगा जैसे ज़माना दस्तरस में आ गया है

ये किस कोंपल खुली सा'अत सदा दी है किसी ने
रुतों का रस हर इक तार-ए-नफ़स में आ गया है

हम उस कूचे से निस्बत की ख़ुशी कैसे सँभालें
हमारा नाम उस के ख़ार-ओ-ख़स में आ गया है

लहू में लौ कहाँ मौजूद ज़िंदा राब्ते की
निभाने को फ़क़त बे-रूह रस्में आ गया है

अना के फ़ैसले क्या मर्ज़ी-ए-पिंदार कैसी
मिरा होना न होना उस के बस में आ गया है

उतर आए उन आँखों में कुछ ऐसे 'अक्स 'आली'
कि दिल फिर से गिरफ़्त-ए-पेश-ओ-पस में आ गया है