उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hujum-e-yas mein jina bhi ek azab hua

हुजूम-ए-यास में जीना भी इक 'अज़ाब हुआ

ہجوم یاس میں جینا بھی اک عذاب ہوا

शायर: Bakhtiyar Ziya5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हुजूम-ए-यास में जीना भी इक 'अज़ाब हुआ
यही हुआ कि मोहब्बत में दिल ख़राब हुआ

छुपा हुआ है जो चेहरा हया के दामन में
न कोई आईना उस हुस्न का जवाब हुआ

बहम उलझते रहे शैख़-ओ-बरहमन अब तक
जो हम उठे तो ज़माने में इंक़लाब हुआ

तुम्हारे हुक्म पे हस्ती मिटा चुके हम तो
मगर हमारी वफ़ाओं का क्या जवाब हुआ

मिरी नवा से लरज़ने लगा निज़ाम-ए-कोहन
मिरा पयाम 'ज़िया' वज्ह-ए-इंक़लाब हुआ