उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hua hai jab se tassub-zada nazar ka charagh

हुआ है जब से त'अस्सुब-ज़दा नज़र का चराग़

ہوا ہے جب سے تعصب زدہ نظر کا چراغ

शायर: Obaidur Rahman6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हुआ है जब से त'अस्सुब-ज़दा नज़र का चराग़
हिसार-ए-ज़ुल्मत-ए-शब में है सब के घर का चराग़

जो ख़ुश-निगाह थे ठहरे वो मो'तरिफ़ मेरे
कि मेरे हाथ में रौशन रहा हुनर का चराग़

इरादे जिस के जवाँ हैं नज़र है जिस की हसीं
उसी के वास्ते जलता है रहगुज़र का चराग़

कोई अंधेरा मिरा दिल बुझा नहीं सकता
तुम्हारी याद बनी है मिरे सफ़र का चराग़

ग़ुरूर जिन को बहुत है उड़ान पर अपनी
जला न डाले कहीं उन को बाल-ओ-पर का चराग़

मिरे लहू से बहारों की आबरू है 'उबैद'
मिरी नवा से फ़रोज़ाँ हर इक जिगर का चराग़