उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hijr ke hath se ab KHak paDe jine mein

हिज्र के हाथ से अब ख़ाक पड़े जीने में

ہجر کے ہاتھ سے اب خاک پڑے جینے میں

शायर: Bahadur Shah Zafar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हिज्र के हाथ से अब ख़ाक पड़े जीने में
दर्द इक और उठा आह नया सीने में

ख़ून-ए-दिल पीने से जो कुछ है हलावत हम को
ये मज़ा और किसी को नहीं मय पीने में

दिल को किस शक्ल से अपने न मुसफ़्फ़ा रक्खूँ
जल्वा-गर यार की सूरत है इस आईने में

अश्क ओ लख़्त-ए-जिगर आँखों में नहीं हैं मेरे
हैं भरे लाल ओ गुहर इश्क़ के गंजीने में

शक्ल-ए-आईना 'ज़फ़र' से तो न रख दिल में ख़याल
कुछ मज़ा भी है भला जान मिरी लेने में