उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hazar zulm sahe aur malal bhi na kare

हज़ार ज़ुल्म सहे और मलाल भी न करे

ہزار ظلم سہے اور ملال بھی نہ کرے

शायर: Nafas Ambalvi4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हज़ार ज़ुल्म सहे और मलाल भी न करे
ये हुक्म है कि रे'आया सवाल भी न करे

अमीर-ए-शहर का फ़रमान है कि ज़ब्त करो
वो घर जला दे तो कोई वबाल भी न करे

ख़ुदा से ऐसी मसाफ़त न माँग ऐ नादाँ
कि जो थकन भी न दे और निढाल भी न करे

उसे मैं दोस्त नहीं दुश्मनों में गिनता हूँ
जो तर्क कर के त'अल्लुक़ बहाल भी न करे