उर्दू शायरी · ग़ज़ल

haT-dharmi ki kahun ki main iman ki kahun

हट-धर्मी की कहूँ कि मैं ईमान की कहूँ

ہٹ دھرمی کی کہوں کہ میں ایمان کی کہوں

शायर: Maharaja Sir Kishan Parashad Shad11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हट-धर्मी की कहूँ कि मैं ईमान की कहूँ
अपना करूँ बयाँ कि तिरी शान की कहूँ

दिल में ये अब ठनी है कि ईमान की कहूँ
कुछ कर के मुख़्तसर मैं तिरी शान की कहूँ

मेरी जो वो सुनें कभी मौक़ा मुझे मिले
सब दिल का हाल कैफ़ियत अरमान की कहूँ

पाबंद-ए-दाम-ए-ज़ुल्फ़ है आशुफ़्ता दिल मिरा
क्या सरगुज़श्त ऐसे परेशान की कहूँ

दीवानगी में भी रहे ज़र्ब उस के नाम की
मैं बद-हवास हो के भी औसान की कहूँ

कुछ दीन की सुनाऊँ कि दुनिया की दास्तान
कुछ क़ुदसियों की लिख्खूँ कि इंसान की कहूँ

मैं ध्यान में हूँ उस के वो है राज़-दाँ मिरा
कुछ मेज़बाँ की लिख्खूँ कि मेहमान की कहूँ

याँ है भरोसा हक़ पे वहाँ अक़्ल पर मदार
हालत कहूँ गदा की कि सुल्तान की कहूँ

हक़ कहने वालों के लिए है दार की सज़ा
बन जाए जान पर अगर ईमान की कहूँ

मैं हूँ किताब-ए-मा'रिफ़त-ए-हक़ का दर्स-याब
अब क्या किसी से वेद की क़ुरआन की कहूँ

है 'शाद' पुर-बहार ये जोश-ए-जुनूँ मिरा
दामन की अब कहूँ कि गरेबान की कहूँ