उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har ek gham ko masarrat mein Dhaalne wala

हर एक ग़म को मसर्रत में ढालने वाला

ہر ایک غم کو مسرت میں ڈھالنے والا

शायर: Vaqar Faruqi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर एक ग़म को मसर्रत में ढालने वाला
कहाँ गया वो तबस्सुम उछालने वाला

ये उस के रश्क-ओ-हसद ख़ुद उसे डुबोएँगे
मरेगा ज़हर से ख़ुद साँप पालने वाला

लगा सका न मिरे ज़र्फ़ का वो अंदाज़ा
उभर सका न समुंदर खंगालने वाला

बचा सकेगा न ख़ुद को ज़लील होने से
हमारी ज़ात पे कीचड़ उछालने वाला

ख़ुशी का लहजा कभी तो अता करेगा मुझे
जहाँ के ग़म मिरी झोली में डालने वाला

तुम्हारी बज़्म-ए-तरब में 'वक़ार' आया है
हर एक ज़ख़्म को शे'रों में ढालने वाला